शरीर में वात दोष का बिगड़ना त्वचा के रूखेपन, बालों की कमजोरी, हृदय गति की अनियमितता और मानसिक अशांति का कारण बनता है। आयुर्वेद इसे वायु तत्व मानता है और संतुलन के सरल उपाय सुझाता है। आजमाएं ये प्रभावी तरीके।
तेल सेवन से शुरुआत करें। तिल तेल का नियमित प्रयोग वात को जमीन पर उतारता है। सब्जियों या रोटी पर डालकर खाएं। यह जोड़ों को चिकनाहट देता है और कब्ज दूर करता है।
पूरे शरीर का अभ्यंग करें या कम से कम महत्वपूर्ण भागों पर। शुष्कता वात का प्रमुख लक्षण है। नारियल या तिल तेल से मालिश त्वचा को नमी प्रदान करती है और तनाव मुक्त करती है। सुबह स्नान से पहले करें।
पसीना लाने वाले स्वेदन को नजरअंदाज न करें। जॉगिंग, प्राणायाम या हॉट फेरमेंटेशन से टॉक्सिन्स बाहर होते हैं। इससे सर्कुलेशन बेहतर होता है और ऊर्जा संतुलित रहती है।
भोजन में संतुलित रस रखें—खट्टे आमले, मीठे फल और नमकीन सूप। गुनगुना खाना ही ग्रहण करें। इससे अग्नि प्रदीप्त रहती है और वात की वृद्धि रुकती है। रात का भोजन हल्का रखें।
दर्द वाले स्थान पर गर्म पट्टी बांधें। वेष्टन हड्डियों के रोगों में वात को शांत करता है। इन पांचों आदतों से न केवल वात संतुलित होगा बल्कि समग्र स्वास्थ्य में सुधार आएगा। निरंतरता ही कुंजी है।