माघ मेले का राजसी स्नान धार्मिक विवाद का केंद्र बन गया, जहां ज्योतिषपीठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ पुलिस की कथित गुंडागर्दी ने सनातन परंपराओं को चुनौती दी। इस घटना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल पीआईएल ने संतों के सम्मान की लड़ाई को नई दिशा दी है।
अधिवक्ता उज्ज्वल गौर की याचिका संविधान के अनुच्छेद 14, 21 व 25 के उल्लंघन पर केंद्रित है। मौनी अमावस्या (18 जनवरी) को पालकी रोकना, शिष्यों से धक्कामुक्की, ब्राह्मणों को अपमानित करना- ये दृश्य वायरल वीडियो में कैद हैं, जो पुलिस की असंवेदनशीलता उजागर करते हैं।
याचिकाकर्ता ने चेताया कि संतों से पंगा लेने की कोई तय नीति न होने से पुलिस की मनमानी बेलगाम हो रही है। इससे धार्मिक आयोजनों की पवित्रता खतरे में पड़ रही है और भक्तों का मन दुखी हो रहा है।
राहत के रूप में मांगी गई है मेला-स्तरीय एसओपी, जिसमें धर्माचार्यों के स्नान मार्ग, पालकी सुरक्षा और विशेष व्यवस्था सुनिश्चित हो। इसके अलावा, सरकारी जुल्मों के खिलाफ प्रभावी शिकायत प्रणाली बने, जिसमें तुरंत न्याय मिले। पुलिस के लिए सख्त दिशानिर्देश भी जारी हों।
संगम की ओर बढ़ते शंकराचार्य को भीड़ नियंत्रण के बहाने रोका गया, विरोध बढ़ा तो मारपीट हुई। स्वामी जी ने इसे अपमान मानकर लंबा धरना दिया, अनशन किया और स्नान त्यागकर 28 जनवरी को काशी चले गए। सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा- नकली हिंदुत्व को बढ़ावा मिल रहा है।
अब सुप्रीम कोर्ट की नजर इस पर। फैसला आने पर धार्मिक उत्सवों में संतों का मान-सम्मान सुरक्षित होगा, जो हिंदू समाज की एकता के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है।