सर्वोदय दिवस पर गांधीजी के जीवन दर्शन की याद आती है, जो सिनेमा के माध्यम से जीवित है। अहिंसा और सत्य के ये सिद्धांत फिल्मों में नए रूपों में दिखते हैं—ऐतिहासिक नाटक से हास्यपूर्ण ड्रामा तक। ये दर्शकों को आज के संघर्षों से जोड़ती हैं।
बॉलीवुड ने गांधीवाद को समकालीन बनाया है, युवाओं को सिखाया कि प्रेम और सत्य से क्रांति संभव है। क्लासिक ‘गांधी’ (1982) से ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ (2006) तक की ये रचनाएं प्रेरणा स्रोत हैं।
बेन किंग्सले अभिनीत ‘गांधी’ गांधीजी की पूरी यात्रा चित्रित करती है, सत्याग्रह की नींव दक्षिण अफ्रीका से रखती है।
‘लगे रहो मुन्ना भाई’ में राजकुमार हिरानी ने संजय दत्त के किरदार से दिखाया कि गुंडा भी बदल सकता है।
‘गांधी मेरे पिता’ (2007) परिवारिक टकराव पर रोशनी डालती है, अक्षय खन्ना प्रभावशाली।
‘हे राम’ (2000) कमल हासन की महत्वाकांक्षी कोशिश, विभाजन काल के दर्द को गांधी चश्मे से देखती है।
अनुपम खेर की ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ (2005) हत्या के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को उकेरती है।
‘महात्मा का निर्माण’ (1996) गांधीजी के प्रारंभिक संघर्ष दिखाती है।
इनके जरिए बापू का संदेश अमर हो रहा है, समाज को दिशा दे रहा है।