30 जनवरी को विश्व कुष्ठ रोग दिवस मनाते हुए भारत गांधीजी की स्मृति में कुष्ठ पीड़ितों के सम्मान का संदेश दोहराता है। बापू ने इन मरीजों की सेवा से कलंक तोड़ा था, वही भावना आज भी प्रासंगिक है।
दिन का उद्देश्य जागरूकता फैलाना, मिथकों को दूर करना और मरीजों को समाज की मुख्यधारा में लाना है। यह बैक्टीरिया जनित संक्रामक रोग त्वचा व अंगों को नुकसान पहुंचाता है, मगर मुफ्त मल्टी ड्रग थेरेपी से जल्दी ठीक हो जाता है। समय पर चेकअप से अपंगता टल जाती है।
समस्या का मूल कलंक ही है। गलतफहमियां जैसे तेजी से फैलना, कोई दवा न होना या श्राप मानना, मरीजों को अलग-थलग कर देती हैं। परिवार त्याग देता है, रोजगार छिन जाता है, शिक्षा रुक जाती है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, डर के कारण देरी से इलाज होता है, जो जटिलताएं बढ़ाता है। विशेषज्ञ जोर देते हैं- चिकित्सा आसान, सामाजिक पूर्वाग्रह कठिन।
गांवों में रैलियां, स्कूलों में व्याख्यान, चिकित्सा शिविर और बातचीत के सत्र होते हैं। भारत सरकार व डब्ल्यूएचओ के अभियान से मामले घट रहे हैं। दुनिया के 53 फीसदी केस भारत में, लेकिन 2027 तक उन्मूलन का सपना। सभी को मिलकर कलंक मिटाएं।