बांग्लादेश में 12 फरवरी के चुनाव प्रचार के दौरान धर्म को राजनीतिक हथियार बनाने का चलन तेज हो गया है। कुछ पार्टियां साफ कह रही हैं कि उनका विरोध इस्लाम विरोध है। एक रिपोर्ट में इसे वैधता संकट में दुश्मनों को बदनाम करने का तरीका बताया गया।
देशभर में धार्मिक उग्रवाद संस्कृति को कुचल रहा है। संगीत कक्षाओं पर बैन, दरगाहों पर प्रहार, नाट्य दलों को धमकी और पाठ्यक्रम में पक्षपाती बदलाव हो रहे हैं। प्रथम आलो के स्तंभकार हसन फिरदौस ने इतिहास खंगाला, जहां 1971 के पाकिस्तानी नरसंहार को धर्म ने जायज ठहराया था।
उन्होंने चेताया कि राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का शोषण अब चरम पर है। धार्मिक नाम वाले दल साफ अपनी मंशा दिखाते हैं। सत्ता पाते ही अल्पसंख्यकों पर कहर बरपता है—पाकिस्तान के अहमदियों या शिया हमलों जैसा। यहां सोशल मीडिया पर टिप्पणियां हिंसा का बहाना बन रही हैं।
एक राजनीतिक समूह ने महिलाओं को प्रतिदिन पांच घंटे काम का सुझाव दिया, जो आर्थिक बहिष्कार और घरेलू कैद की रणनीति है। जमात-ए-इस्लामी ऊपर से शरिया न थोपने का ढोंग करती है, नीचे से नेता और कार्यकर्ता टीवी पर प्रचार करते हैं। उनका तराजू चिह्न धार्मिक कर्तव्य और स्वर्ग का दरवाजा बता रहे हैं।
यह विरोधाभास बांग्लादेश को धर्म के राजनीतिकरण के खतरनाक मोड़ पर पहुंचा रहा है। लोकतांत्रिक मूल्य खतरे में हैं। मतदाताओं को इस जाल से सावधान होकर फैसला लेना होगा, ताकि देश की धर्मनिरपेक्ष छवि बनी रहे।