संगीत सम्राट पंडित जसराज की जयंती पर याद आती है वह ऐतिहासिक पल, जब 1960 में उन्होंने उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का शिष्य बनने का सम्मानजनक प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। खां साहब रो पड़े, लेकिन जसराज की मेवाती निष्ठा पर गर्व हुआ।
मुंबई यात्रा के दौरान डॉक्टर संग खां साहब से मिले। सेवा से प्रसन्न उस्ताद ने शागिर्दी की पेशकश की। जसराज ने कहा, ‘चाचा जान, पिताजी की परंपरा निभानी है।’ भाई पंडित मणिराम के सान्निध्य में विरासत संभालनी थी। भावुक खां साहब की दुआएं आज भी प्रेरणा देती हैं।
जन्म 28 जनवरी 1930 को हआ। पिता पंडित मोतीराम के साये में बचपन बिता। चार वर्ष में पितावियोग, फिर भाइयों ने संगीत सिखाया। शैशव में सरगम गाते लड़खड़ाते, पिता हंसते। 11 की उम्र में तबला, लेकिन गायकी में कमाल।
विश्व विख्यात मेवाती गायक बने। ‘जसरंगी’ जुगलबंदी की रचना की। भजन आध्यात्मिक झंकार जगाते। विदेशों में लाखों मंत्रमुग्ध। 2020 में अलविदा, पर स्वर अनंत।