कोलकाता। बीरभूम की कुशल कांथा कलाकार तृप्ति मुखर्जी को पद्मश्री पुरस्कार मिलना पारंपरिक कला के संरक्षण और महिला सशक्तिकरण की मिसाल है। मां से प्राप्त यह कला आज न केवल उनकी पहचान है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का साधन भी बन चुकी है।
सम्मान पाकर तृप्ति ने अपनी भावनाएं साझा करते हुए कहा कि मां की सीख ही इस सफलता का मूल है। उन्होंने जिले के हर गांव में जाकर 20 हजार से अधिक महिलाओं को नक्षी कांथा सिखाई, जिससे वे स्वावलंबी बनीं।
ग्रामीण महिलाओं का उत्साह तृप्ति को हमेशा प्रोत्साहित करता रहा। उनकी कढ़ाई कलाएं गांव की जिंदगी को जीवंत रूप से चित्रित करती हैं, जिसमें संघर्ष और आशाएं स्पष्ट दिखती हैं। राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सराहना प्राप्त हो चुकी है।
पिछले सम्मानों में 2012 का राष्ट्रीय पुरस्कार, 2017 का बंगश्री और 2018 का शिल्पगुरु शामिल हैं। पद्मश्री ने उनके योगदान को चरमोत्कर्ष प्रदान किया।
शौक से शुरू हुई यह कला आज राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। तृप्ति मुखर्जी साबित करती हैं कि सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर समाज को बदला जा सकता है।