चीन के विशाल निवेशों पर पाकिस्तान में आतंकी संगठनों का साया गहरा गया है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) तब तक सुरक्षित नहीं रह सकता, जब तक इस्लामाबाद जिहादियों और विद्रोहियों पर अंकुश नहीं लगाता। मंगलवार जारी रिपोर्ट ने इस खतरे को रेखांकित किया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐतिहासिक भूलों को नजरअंदाज करने पर चीन को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है- नागरिकों की हानि, रुकी परियोजनाएं और अंतरराष्ट्रीय छवि पर आंच।
दिमित्रा स्टाइको ने यूरोप वायर में लिखा कि बीजिंग अब स्थिरता के खोखले वादों से आगे बढ़ा है। विशेष सुरक्षा दलों और साझा ट्रेनिंग से साफ है कि पाकिस्तान पर दबाव बढ़ रहा है। महत्वपूर्ण साथी रहने के बावजूद, अब शर्तें सख्त हैं।
यह रिश्ता वैचारिक समानता से निकलकर विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया। 2024-25 के हमलों ने संकट गहरााया। शांगला धमाके में डासू प्रोजेक्ट के पांच चीनी इंजीनियर व ड्राइवर शहीद। कराची में दो और चीनी मारे गए। बलूच लिबरेशन आर्मी का बलूचिस्तान में तांडव जारी।
हमलों ने तनाव चरम पर पहुंचाया, चीन को सुरक्षा मजबूत करने की खुली मांग करनी पड़ी। सहयोग की आड़ में पाकिस्तान की कमजोरियां साफ हैं।
आईएसआईएस-के ने 2025 में शहरों, सीमाओं और बुनियादी ढांचे पर कब्जा जमाया। दक्षिण एशिया में चीनी हमले अब संगठित अभियान हैं, पाकिस्तान इसके केंद्र में। सीपीईसी की रक्षा के लिए सुरक्षा व्यवस्था में आमूल बदलाव जरूरी है।