गणतंत्र दिवस से ठीक पहले पद्म सम्मानों की घोषणा में बीएचयू के दो प्रोफेसरों का नाम शामिल हुआ, जिनमें कालाजार विशेषज्ञ श्याम सुंदर अग्रवाल प्रमुख हैं। 38 साल की मेहनत रंग लाई और उन्हें पद्मश्री मिला।
मुजफ्फरपुर के कालाजार प्रभावित इलाकों से निकलकर प्रो. अग्रवाल ने बीमारी की जड़ों पर प्रहार किया। पहले जांच में हफ्तों लगते थे, दवाएं सिर्फ एक तिहाई मरीजों को ठीक करतीं और दर्जनों मर जाते। उन्होंने तेज टेस्ट और नई दवाओं का रास्ता दिखाया।
आरके-39 जांच, लिपिड आधारित एकल डोज एम्फोटेरिसिन-बी, मिल्टेफोसीन का विकास और मल्टी ड्रग थेरेपी—ये सभी उनके नवाचार हैं। डब्ल्यूएचओ की मुहर के साथ ये भारत के नियंत्रण कार्यक्रम का हिस्सा बने। 2002 का बड़ा ट्रायल उनकी अगुवाई में हुआ, जिसमें मौखिक दवा ने कमाल दिखाया।
सरकार का धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि यह टीम वर्क का नतीजा है। उनका कार्य कालाजार को समाप्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहा है, जो स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए प्रेरणा है।