हैंडलूम के गुमनाम योद्धा खेमराज सुंदरियाल को पद्मश्री मिला है। पानीपत उद्योग को 60 बरसों में नई पहचान देने वाले इस कलाकार ने जामदानी को ऊनी शॉल पर बुनकर इतिहास रचा। उत्तराखंड मूल के खेमराज की मेहनत ने देश-विदेश में नाम कमाया।
हुसैन साहब की पेंटिंग्स को कपड़े पर उतारने का जादू उनके हाथों हुआ। 1966 में वीआईपी पानीपत आकर खेस को विविध उत्पादों में ढाला। टेपेस्ट्री में महारथ हासिल कर लूम को कैनवास बना दिया।
पक्के रंगों की क्रांति लाने वाले खेमराज ने ट्रेनिंग से इंडस्ट्री बदली। सुमाड़ी के किसान घराने से बुनाई सीखे बिना उन्होंने चुनौतियों को पार किया।
सरकार के इस कदम की तारीफ करते हुए वे कहते हैं, अब काबिलियत मायने रखती है। युवा ईमानदारी से हस्तशिल्प अपनाएं। आवेदन के साल भर बाद फोन से खुशखबरी मिली, घर में उत्साह छाया। पुत्रवधू ने कहा, कला को दुनिया की मान्यता मिली। यह सम्मान परंपरा को मजबूत करेगा।