77वें गणतंत्र दिवस के मौके पर दार्शनिक आचार्य प्रशांत ने जोर देकर कहा कि संवैधानिक व्यवस्था के साथ-साथ व्यक्तिगत जागरण अनिवार्य है। नई दिल्ली से उनका संदेश था – भीतरी स्वाधीनता ही गणतंत्र को मजबूत बनाती है।
गणराज्य में जनता स्वयं शासक होती है, बाहरी राजसत्ता अस्वीकार्य। लोकतंत्र इसी सिद्धांत पर टिका है। किंतु आंतरिक चुनौतियां बड़ी हैं – वासनाएं, कুविचार, अहंकार हमें शोषित करते हैं, बाह्य आक्रमणकारियों से कहीं अधिक।
प्रस्तावना संविधान का आध्यात्मिक सार है। ‘हम भारतवासी संकल्प से संविधान अर्पित करते हैं’ – स्वायत्तता और आत्मसमर्पण का प्रतीक।
भगवद्गीता से उदाहरण: कृष्ण ने अर्जुन को आंतरिक बोध दिया, न कि युद्धकौशल। आंतरिक स्वतंत्रता बाहरी बंधनों को नष्ट करती है।
संविधान के आदर्श – समाजवाद, पंथनिरपेक्षता, बंधुता – व्यक्तिगत परिवर्तन के बिना व्यर्थ। स्वतंत्रता, समानता आदि बिना भीतरी उजाले के सजावटी मात्र।
अजागृत जन से लोकतंत्र भीड़ का राज। समाजवाद ईर्ष्या में न बदले। धर्मनिरपेक्षता अहंकार से मुक्त हो।
युवा वर्ग को संदेश: राष्ट्र हम हैं। स्वयं निर्माण करें। अध्यात्म का अर्थ स्वनिरीक्षण, दोषों का त्याग।
भारतीय ऐसा अपनाएंगे तो राष्ट्र तेजी से उत्कृष्ट बनेगा, विश्व हमसे सीखेगा। हमारा राष्ट्रवाद शांतिप्रिय, सार्वभौमिक।
निष्कर्षतः, संविधान जागृत व्यक्ति मांगता है। उन्नत नागरिकों से उन्नत राष्ट्र।