गोल्डमैन सैश के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापारिक डील में यदि और देरी हुई तो आरबीआई रेपो दरों में कटौती का रुख अपना सकता है। वित्त वर्ष 27 की शुरुआती तिमाही तक व्यापारिक बाधाएं बनी रहीं तो विकास पर असर पड़ सकता है, जिससे केंद्रीय बैंक को नीतिगत ढील की जरूरत पड़ेगी।
देश में खपत सुधार ग्रामीण इलाकों और शहरी गरीब तबके तक सीमित है। उन्नत कृषि उत्पादन, निम्न आय वाली महिलाओं के लिए सरकारी नकद सहायता और जीएसटी राहत ने उपभोग के आधारभूत स्तर को बल दिया है। ये प्रयास वैश्विक जोखिमों के बावजूद मांग पुनरुद्धार में मददगार साबित हो रहे हैं।
गोल्डमैन के शीर्ष अर्थशास्त्री शांतनु सेनगुप्ता ने एनडीटीवी प्रॉफिट से कहा कि सौदा वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में पूरा होने की संभावना है। मगर यदि यह टलकर अगले साल की पिछली छमाही पहुंचा, तो आर्थिक गति प्रभावित हो सकती है। तब सरकार व आरबीआई को सक्रिय कदम उठाने होंगे।
उपभोग की तस्वीर आय के आधार पर मिश्रित है। अमीर वर्ग की खरीदारी महामारी बाद चरम पर पहुंची, अब मंदी के संकेत हैं। मध्यम आय समूह बेरोजगारी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रसार से परेशान है।
सरकार ने वित्त वर्ष 2026 के लिए वित्तीय कड़ापन कम किया, करों में छूट देकर उपभोक्ता खर्च बढ़ाया। नतीजा, 2025 में 7.6% की मजबूत वास्तविक जीडीपी वृद्धि। लेकिन नाममात्र वृद्धि कम महंगाई से निचले पायदान पर आ गई।
यह पूर्वानुमान व्यापार समझौते की अहमियत रेखांकित करता है। विलंब आरबीआई के हस्तक्षेप को मजबूर कर सकता है।