इस्लामाबाद में पत्रकारों का जीवन मुश्किलों भरा हो गया। नई रिपोर्ट बताती है कि डिजिटल अपराध कानून, आपराधिक मानहानि मुकदमे और खुफिया दबाव ने प्रेस फ्रीडम को गहरी चोट दी। शनिवार जारी दस्तावेज चिंताजनक तस्वीर पेश करता है।
प्रदर्शनों, राजनीतिक आंदोलनों और विवादास्पद मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने वालों को धमकियां, पिटाई और अस्थायी गिरफ्तारियां झेलनी पड़ रही। यूनियनों के रिकॉर्ड में ऐसी कई घटनाएं, पर दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं।
ऑनलाइन महिला रिपोर्टरों पर संगठित ट्रोल अभियान, भयभीत करने वाली चेतावनियां और पेशेवर छवि खराब करने की चालें आम। धार्मिक-राजनीतिक कवरेज में खतरा दोगुना।
प्रतिबंधक माहौल में कानून, सुरक्षा, पैसा और डिजिटल रोकें हावी। संवैधानिक अधिकारों के बावजूद सुरक्षा-धार्मिक रिपोर्टिंग पर पाबंदी।
समाचार कक्षों में सेंसरशिप का बोलबाला—खबरें टालना या बदलना रूटीन। नतीजा: सार्वजनिक बहस कमजोर, सोशल मीडिया अफवाहें हावी।
क्षेत्रीय अंतर स्पष्ट—सीमावर्ती प्रांतों में शहरों से कहीं ज्यादा जोखिम, संसाधनों की कमी से। तत्काल कदम उठाने की जरूरत।