बॉलीवुड के शोमैन सुभाष घई ने फिल्मों में हो रहे परिवर्तनों पर खुलकर चर्चा की। उनकी फिल्में न केवल मनोरंजन देती हैं बल्कि गहन संदेश भी। बातचीत में उन्होंने शिक्षा से सिनेमा के तालमेल, पुराने गानों के रीमेक और एक्शन मूवीज के क्रेज पर राय दी।
घई के पास सिनेमा में 50 तो शिक्षा में 25 साल का तजुर्बा है। एफटीआईआई पुणे से अभिनय सीखकर वे अभिनेता बने, फिर लेखक-निर्देशक। 18-19 फिल्में बनाईं, ज्यादातर हिट। कंपनी को आईपीओ दिलवाया, डिस्ट्रीब्यूशन-एग्जिबिशन में उतरे और व्हिसलिंग वुड्स शुरू किया।
स्कूल की शुरुआत का कारण बताया, ‘छोटे शहरों के बच्चे मुंबई में खो जाते हैं। यहां विशेषज्ञों से जुड़ाव, प्रैक्टिस और 2-3 साल की तैयारी से इंडस्ट्री में आसान प्रवेश मिलता है।’
क्लासिक्स के रीक्रिएशन को वे स्वाभाविक मानते हैं। ‘मोजार्ट से विशाल भारद्वाज, केएल सहगल से विजय आनंद—हर 30 साल में नई पीढ़ी आती है। सिनेमा समय के साथ बदलता है, अब ओटीटी ने विविधता ला दी।’
एक्शन दौर पर बोले, ’70 के दशक में बच्चन का जमाना, 90 में प्रेम कहानियां। ट्रेंड साइकिलिक है, दर्शक एकरसता से ऊबते हैं।’ घई का दृष्टिकोण उद्योग को नई प्रेरणा देता है।