सिंध के जैकबाबाद जिले में पुलिस हिरासत में नाबालिग से गैंगरेप की घटना ने पाकिस्तान की कानूनी प्रक्रियाओं पर काला धब्बा लगा दिया। छह पुलिसवालों की गिरफ्तारी भले ही दिखावा हो, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि ऊपरी स्तर की जवाबदेही के बिना यह अपर्याप्त है।
महिलाओं को पुरुष अफसरों के साथ बंद कमरों में ठहराना कानून का उल्लंघन था। एक्सप्रेस ट्रिब्यून लिखती है, ‘शोषण से पहले ही राज्य विफल हो चुका। हिरासत का मकसद पुलिस शक्ति को अंकुश लगाना है, नहीं तो विस्तार देना।’
अन्य अपराध में वांछित पुरुषों के रिश्तेदारों—महिलाओं और बच्चों—को बंधक बनाकर दबाव डालना अमानवीय है। ऐसी रणनीतियां इसलिए सफल होती हैं क्योंकि सख्त सजाएं कम मिलती हैं। पुलिस पर केस होने पर न्याय की राह कांटों भरी, स्वतंत्र जांच और गवाहों की सुरक्षा के अभाव में।
महिला पुलिस की भारी कमी और संरक्षण प्रकोष्ठों की निष्क्रियता सुधारों की विफलता दिखाती है। सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू नहीं हो पाए। रिपोर्ट पूछती है: अनुमति किसकी? नजरअंदाजी किसकी? दखल न देने की गलती किसकी? जिम्मेदारी कहां थमेगी?
साहिल की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 के जनवरी-नवंबर में महिलाओं पर अपराध 25% बढ़कर 6,543 हो गए (2024 में 5,253)। 81 अखबारों से आंकड़े: 1,414 हत्या, 1,144 किडनैपिंग, 1,060 मारपीट, 649 सुसाइड, 585 बलात्कार।
देश को हिरासत नियमों में सख्ती, निगरानी और उच्च स्तरीय कार्रवाई की जरूरत है। बिना बदलाव के ऐसी त्रासदियां जारी रहेंगी।