नेल्लोर के राजराजेश्वरी मंदिर में तंत्र साधना की देवी मां राजराजेश्वरी का शांत स्वरूप भक्तों को आकर्षित करता है। दस महाविद्याओं की रानी के रूप में पूज्य, यहां मां सौंदर्यपूर्ण और आनंदमयी रूप धारण किए हैं। तांत्रिक परंपराओं के अनुसार यज्ञ, हवन और विशेष पूजन से सभी कष्ट दूर होते हैं।
51 यंत्रों वाले गर्भगृह के कारण मंदिर शक्तिपीठ का दर्जा प्राप्त है। मां राजराजेश्वरी को षोडशी त्रिपुरासुंदरी के नाम से जाना जाता है। उनकी मूर्ति मेरु यंत्र पर है, हाथों में शंख-चक्र-धनुष, साथ में सरस्वती-लक्ष्मी। नवग्रहों की कलाकृति पूजा को बल प्रदान करती है।
कुंडली में राहु दोष के निवारण के लिए 18 सप्ताह तक विशेष दीप प्रज्वलन किया जाता है। घी-नींबू के दीप, चंडी होमम और परिक्रमा से ग्रहपीड़ा शांत होती है। भक्तों के अनुभव चमत्कारिक हैं।
दशहरा पर्व पर मंदिर उत्सवों से गुलजार रहता है। पूरे दिन-रात जागरण, पूजन और मेले का आयोजन मां की राक्षसों पर विजय का स्मरण कराता है।
प्राचीन कथा के अनुसार, पीठाधिपति अरुल ज्योति नागराज ने दुर्गामित्ता के मैदान में देवी दर्शन पाकर मंदिर स्थापित कराया। समय के साथ सुब्रह्मण्येश्वर, सुंदरेश्वर, गायत्री और गणेश मंदिर जुड़े।
तंत्र काट, ग्रह शांति और सिद्धि प्राप्ति के लिए यह मंदिर प्रसिद्ध है। भक्तों को यहां शांति और समृद्धि अवश्य मिलती है।