पटना से सत्येंद्र जी महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को शंकराचार्य पद की गरिमा के विपरीत आचरण का दोषी ठहराया। उनका कहना है कि अनुशासन धर्माचार्यों का मूलमंत्र है। शंकराचार्य को व्यवस्था का पालन कर धर्म को मजबूत बनाना चाहिए, न कि स्वयं विवाद खड़े करने चाहिए।
चार मठों के संस्थापक आदि शंकराचार्य के आदर्शों का हवाला देते हुए सत्येंद्र जी बोले कि अन्य शंकराचार्य शांतिपूर्ण रहते हैं। अविमुक्तेश्वरानंद पर समाजवादी पार्टी व कांग्रेस से जुड़ाव का आरोप लगाते हुए उन्होंने प्रयागराज घटना का जिक्र किया। 17 जनवरी को पालकी में संगम पहुंचे अविमुक्तेश्वरानंद को पुलिस ने रोका, जिससे विवाद भड़का। बाद में माघ मेले में धरना दिया।
‘केवल वे ही क्यों माघ मेले गए और पालकी पर जिद की?’ सत्येंद्र जी ने ताना मारा। स्वयंभू शंकराचार्य बताकर उन्होंने कहा कि ऐसी हरकतें सरकार को बाध्य करती हैं। कुंभ मेला जैसे मेले में लाखों भक्तों की सुरक्षा के लिए अनुशासन जरूरी है।
सत्येंद्र जी के विचार धार्मिक जगत में बहस छेड़ देंगे। परंपरागत गरिमा बनाए रखने के लिए नेताओं को जिम्मेदार बनना होगा। यह घटना सबक सिखाती है कि भक्ति में व्यवस्था का सम्मान अनिवार्य है।