वसंत भारत का सबसे प्रिय ऋतु है, जो जीवन की ताजगी, उमंग और विद्या का संदेश लाता है। ठंडी सर्दी अब सुनहरी किरणों में बदल चुकी है। फसलें हरी-भरी हो रही हैं, सरसों-चना के फूल चमक रहे हैं। इस पृष्ठभूमि पर सरस्वती मां का आगमन होता है, कला-ज्ञान की अधिष्ठात्री।
हमारे गीतों ने वसंत को भक्ति, रोमांस, जीवन दर्शन और क्रांति के रूप में चित्रित किया है। ‘आलाप’ का ‘माता सरस्वती शारदेय’ शांतिपूर्ण स्तुति है, जो नई शुरुआत प्रेरित करती है।
1967 की ‘उपकार’ में ‘आई झूम के वसंत’ पूरे वातावरण को नचाने वाला है, गुलशन बावरा और कल्याणजी-आनंदजी का कमाल। ‘राजा और रंक’ का ‘संग बसंत अंग बसंती’ दिलों को छूता है, आनंद बख्शी के शब्दों से।
1947 की ‘सिंदूर’ का ‘पतझड़ सावन बसंत बहार’ जिंदगी के उतार-चढ़ाव बयान करता है, शमशाद बेगम की मधुरता के साथ। ‘रुत आ गई रे’ वसंत की ताजगी महसूस कराता है, जावेद अख्तर-आर.डी. बर्मन की देन।
‘रंग दे बसंती’ युवाओं के लिए वसंत को बदलाव का प्रतीक बनाता है। प्रसून जोशी और ए.आर. रहमान ने इसे अमर कर दिया। ये गीत वसंत की सुंदरता को जीवंत रखते हैं।