हिंदी सिनेमा में नेपोटिज्म की चर्चा थमने का नाम नहीं लेती। स्टार किड्स को चमकदार लॉन्च और भारी प्रचार मिलता है, जबकि संघर्षशील बाहरी टैलेंट को मौके की तलाश रहती है। अभिनय के कई वंश इंडस्ट्री को आकार देते रहे हैं।
कुछ स्टार संतानें जैसे जान्हवी कपूर, श्रद्धा कपूर सफल रहीं, तो कई नाकाम। आउटसाइडर्स का दर्द है कि अच्छे रोल उनके हिस्से नहीं आते। इस बहस में विवेक रंजन अग्निहोत्री ने कुम्हार-मटके वाली मिसाल देकर राय रखी।
निर्देशक का कहना है कि नेपोटिज्म को सकारात्मक नजरिए से देखें। कुम्हार यदि अपने पुत्र को मटका बनाने की कला सिखाए और वह उसमें माहिर हो, तो उसे काम मिलना स्वाभाविक है। ठीक वैसे ही जैसे अन्य पेशों में होता है।
समस्या तब गंभीर हो जाती है जब योग्यता न हो। पुत्र मटका बनाने में असफल हो, बार-बार नाकामी मिले, तब भी परिवार के दम पर उसे आगे धकेला जाए। इससे सक्षम कलाकार पीछे धकेल दिए जाते हैं। सारा निवेश बेकार चला जाता है। यही नेपोटिज्म का जहरीला रूप है।
विवेक की यह व्याख्या संतुलित है। यह परिवार परंपराओं का सम्मान करती है, मगर क्षमता को सर्वोपरि बताती है। फिल्म जगत को इस पर गौर करना चाहिए ताकि सच्चा टैलेंट आगे बढ़े।