काशीवासियों के लिए बसंत पंचमी का पर्व बसंत और विद्या की देवी सरस्वती तक सीमित नहीं। इस दिन बाबा विश्वनाथ को तिलक चढ़ाकर महाशिवरात्रि के विवाहोत्सव की विधिवत शुरुआत की जाती है। मंदिर में सजावट, अनुष्ठान और भक्तों की भारी भीड़ का नजारा रोमांचक है।
परंपरा के अनुसार, तिलक के बाद भगवान शिव को विवाह के लिए सजाया जाता है। महाशिवरात्रि 15 फरवरी रविवार को फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी पर आएगी। निशीथ काल मध्यरात्रि पूजन, जागरण और व्रत से भक्त प्रसन्न करते हैं। शहर के सभी प्रमुख मंदिर जैसे काशी विश्वनाथ, गौरी सोमनाथ, तिलभांडेश्वर, अमरनाथ, लोलार्क कुंडेश्वर, महामृत्युंजय, बनखंडी और सिद्धेश्वर महादेव दर्शनार्थियों से भरे रहते हैं।
फिर आती है रंगभरी एकादशी, जो 27 फरवरी शुक्रवार को फाल्गुन शुक्ल पक्ष में मनाई जाएगी। यहां माता पार्वती का गौना होता है, भगवान काशी लौटते हैं और होली प्रारंभ हो जाती है। श्मशान होली और रंगों की धूम मच जाती है। भक्त अबीर-बुक्का चढ़ाते हैं।
यह श्रृंखला काशी की धार्मिक विरासत को मजबूत करती है, जहां भक्ति और उल्लास का अनोखा संगम होता है। दूर-दूर से भक्त इन पर्वों में शरीक होकर आशीर्वाद ग्रहण करते हैं।