ज्ञान और वसंत के प्रतीक बसंत पंचमी पर 23 जनवरी को मां सरस्वती की पूजा होती है। पीला रंग छा जाता है हर ओर। खास तौर पर दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह पर सूफी बसंत का शानदार उत्सव आयोजित होता है, जो सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत प्रमाण है।
यह सब 700 साल पहले की घटना से शुरू हुआ। निजामुद्दीन औलिया भतीजे के जाने का शोक मना रहे थे। शिष्य अमीर खुसरो ने बसंत पंचमी को पीले फूलों और वस्त्रों से सजकर गुरु को प्रसन्न किया। बसंत पूजन की झलक देख गुरु खुश हो गए। उसी दिन से दरगाह पर पीले रंग का राज होता है।
फूलों की मालाओं से सजावट, पीली चादर चढ़ाना, कव्वाली सुनना—सभी धर्मों के लोग इसमें हिस्सा लेते हैं। गंगा-जमुनी तहजीब यहां साकार हो जाती है। हिंदू सरस्वती पूजन की खुशी बांटते हैं, तो अन्य धर्मों के अनुयायी सूफी प्रेम में डूब जाते हैं।
यह आयोजन एकता का संदेश देता है। दरगाह परिसर फूलों की चादर से पट जाता है, और उत्साह चारों ओर फैल जाता है। दिल्ली का यह स्थल पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है, जो सांस्कृतिक समन्वय की मिसाल पेश करता है।