हिंदी सिनेमा के इतिहास में शोले एक मील का पत्थर है। रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी यह फिल्म अपने डायलॉग्स से अमर हो गई। ‘ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर’, ‘जो डर गया समझो मर गया’ जैसे जुमले न सिर्फ फिल्म का हिस्सा हैं, बल्कि हमारी बोलचाल का अंग बन चुके हैं। आइए जानें इनकी रचना की दास्तान।
कराची में 1937 में जन्मे सिप्पी पिता जीपी सिप्पी के प्रभाव में आए। मुंबई में फिल्मी दुनिया ने उन्हें घेर लिया। बचपन में शहंशाह में काम किया, फिर निर्देशन की ओर मुड़े। अंदाज (1971) और सीता और गीता (1972) ने सफलता की नींव रखी।
शोले ने तहलका मचा दिया। अमिताभ, धर्मेंद्र, संजीव, जया, हेमा और अमजद खान की स्टार कास्ट के साथ सिप्पी ने ग्रामीण भारत को सिल्वर स्क्रीन पर उतारा। गब्बर के डायलॉग्स खलनायी की मिसाल बने। आलोचकों की फजीहत झेलने के बाद दर्शकों ने इसे अपनाया, जो पांच साल थिएटर्स में रही।
शक्ति में दिलीप-अमिताभ की जोड़ी, सागर में ऋषि-डिंपल, शान और अकेला जैसी फिल्में बनीं। पद्मश्री और एकेडमी उनकी देन। सिप्पी के डायलॉग्स भावनाओं के आईना हैं, जो पीढ़ियों को जोड़ते हैं। शोले की जय हो!