ग्वालियर से जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के संगम घाट धरने और शंकराचार्य दावे पर कड़ा रुख अपनाया है। मौनी अमावस्या पर गंगा स्नान जुलूस रोकने और शिष्यों-पुलिस भिड़ंत के बाद चला आ रहा यह विवाद अब संत समाज के विभाजन का रूप ले चुका है।
‘उनके साथ अन्याय नहीं, उन्होंने स्वयं अन्याय किया,’ जगद्गुरु ने फरमाया। घाट के स्थानीय नियम साफ हैं- जुलूस प्रतिबंधित, पैदल स्नान ही मान्य। पुलिस की सलाह पर अवमानना ही विवाद का मूल है। ‘हम पैदल जाते हैं गंगा में,’ उन्होंने अपना उदाहरण दिया। शीर्षक विवाद पर प्रशासनिक नोटिस को सही बताते हुए कहा, ‘मैं जगद्गुरु हूं, वे अभी नहीं बने।’
संत समुदाय का बड़ा वर्ग अविमुक्तेश्वरानंद को प्रशासन-विरोधी रुख के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है। ऐसे कदम सनातन धर्म को नुकसान पहुंचाने वालों के हित में जा सकते हैं। उनके बयान धर्म-विरोधियों को हौसला देते हैं।
दिग्विजय सिंह के हिंदू राष्ट्र, आरएसएस और ‘हिंदू’ शब्द वाले बयानों को जगद्गुरु ने खारिज किया। ‘शास्त्रों की उनको ABC नहीं आती,’ उनका तंज था। सिंह ने मनरेगा संग्राम में भारत को विविधताओं का देश बताते हुए फारसी मूल के ‘हिंदू’ को खारिज किया और सनातनी पहचान पर जोर दिया।
यह टकराव धार्मिक और राजनीतिक विचारधाराओं के संघर्ष को दर्शाता है। अविमुक्तेश्वरानंद का धरना जारी है, लेकिन रामभद्राचार्य का मत नियमपालन और शास्त्रीय प्रामाणिकता पर केंद्रित है। आने वाले समय में धार्मिक जत्थों को कानून और परंपरा के बीच संतुलन बनाना होगा।