प्रत्येक वर्ष वसंत पंचमी पर सरस्वती मां की आराधना से विद्या का संचार होता है। नवीन लेखन सामग्री पूज्य रखकर छात्र भविष्य की उज्ज्वलता की कामना करते हैं। किंतु इस त्योहार की गहराई में भगवान शिव का तिलक समारोह छिपा है, जो पार्वती से विवाह की ओर उनका प्रस्थान दर्शाता है।
पुराणों के अनुसार, महाशिवरात्रि का पावन बंधन इसी तिलक से प्रारंभ होता है। वाराणसी की गलियों और मंदिरों में यह रिवाज जीवंत रूप धारण कर लेता है। महादेव को वरमाला की तरह सजाया जाता है—मुख पर हल्दी-चंदन का उज्ज्वल तिलक, गुलाल की छींटें और पुष्पमालाएं।
भक्तों की नजर में यह क्षण भोलेनाथ के गृहस्थ प्रवेश का संकेत है। दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है, जो फूल, हल्दी और प्रणाम चढ़ाते हैं। वसंत ऋतु के स्वागत में यह विधि विशेष महत्व रखती है।
केसरिया मालपुए का नैवेद्य इस उत्सव का मुख्य आकर्षण बनता है। मीठे पकवानों से प्रसन्न होकर भगवान विवाह की पूर्वपीठिका स्वीकार करते हैं। मंदिर परिसरों में विशेष पूजन, आरतियां और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
अन्यत्र होली का डंडा स्थापित कर फाल्गुन की झांकियां बुलाई जाती हैं। इस प्रकार वसंत पंचमी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक उमंग का अनमोल मेल प्रदान करती है, जो पीढ़ियों को प्रेरित करता रहता है।