सिनेमा प्रेमियों के लिए 20 जनवरी हमेशा खास रहेगा। 2010 में इसी दिन वी.के. मूर्ति को दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला, जो 2008 का था। वे इस प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाले पहले सिनेमेटोग्राफर बने।
फिल्म इंडस्ट्री में भारत का दबदबा है, लेकिन सफलता का राज है पूरी टीम का समर्पण। सिनेमेटोग्राफरों की भूमिका सर्वोपरि है, क्योंकि वे ही फिल्म को दृश्यात्मक रूप से जीवंत बनाते हैं—रोशनी का जादू, कोणों की बाजीगरी और फ्रेमिंग की महीन कारीगरी।
पुरस्कार की नींव 1969 में पड़ी, लेकिन मूर्ति तक पहुंचने में लंबा समय लगा। गुरु दत्त की ब्लैक एंड व्हाइट कृतियों—प्यासा, कागज के फूल, चौदहवीं का चांद, साहिब बीबी और गुलाम—में उनकी प्रतिभा चमकती है।
ये फिल्में आज भी सिनेमा की मिसाल हैं। मूर्ति का सम्मान भारतीय सिनेमा में तकनीकी क्षेत्र के योगदान को नई पहचान देता है। यह घटना भविष्य के कलाकारों को प्रोत्साहित करती है कि मेहनत का फल अवश्य मिलता है।