युद्ध के मैदान पर टैंक-तोपों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम। रक्षा जानकारों के अनुसार, इस स्पेक्ट्रम पर नियंत्रण ही भविष्य की लड़ाइयों का फैसला करेगा। तरंगों का यह विशाल संसार सैन्य अभियानों का मूल आधार बन चुका है।
रडार से दुश्मन का पता लगाना हो या सैनिकों का संपर्क कायम रखना, सब स्पेक्ट्रम पर निर्भर। नागोर्नो-करबाख संघर्ष में अजरबैजान ने स्पेक्ट्रम कंट्रोल से जीत हासिल की। रूस का क्रासुहा-4 सिस्टम यूक्रेन में नाटो निगरानी को अंधा कर चुका है।
अमेरिका की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सुपीरियॉरिटी स्ट्रैटेजी और भारत का आत्मनिर्भर अभियान जैसे उत्तम एईएसए रडार इस दौड़ में शामिल हैं। 5जी व स्टारलिंक से स्पेक्ट्रम पर दबाव बढ़ा है, जिसके लिए सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो जरूरी हैं।
साइबर-ईडब्ल्यू एकीकरण से खतरे बढ़े हैं, लेकिन मशीन लर्निंग से अनुकूलन संभव है। विशेषज्ञ कहते हैं, ‘स्पेक्ट्रम योद्धाओं का दौर आ गया है।’ वैश्विक बाजार 2028 तक 20 अरब डॉलर का हो जाएगा। भारत जैसे देशों को अब तैयारी तेज करनी होगी।