तमिलनाडु चुनावों से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पीएमके संस्थापक रामदास गठबंधन को लेकर उलझन में हैं, जबकि डीएमके ने पार्टी को अपने साथ जोड़ने की मुहिम तेज कर दी है।
वन्नियार बहुल इलाकों में मजबूत पकड़ वाली पीएमके को डीएमके मजबूत सहयोगी के रूप में देख रहा है। रामदास का प्रभाव अब भी बरकरार है। डीएमके ने धरमपुरी, विल्लुपुरम जैसी सीटें और महत्वपूर्ण विभाग देने का लालच दिया है।
पार्टी के अंदर कलह उफान पर है। भाजपा समर्थक डीएमके को वैचारिक रूप से विरोधी बता रहे हैं। 2021 में अकेले लड़ने का सबक भूलना मुश्किल है। अंबुमणि रामदास सतर्क रुख अपना रहे हैं।
डीएमके की रणनीति आक्रामक है—वरिष्ठ नेता पीएमके दफ्तर पहुंच रहे हैं, वन्नियार कल्याण के वादे कर रहे हैं। स्टालिन की टीम उत्तरी इलाकों में बढ़त चाहती है।
पीएमके का इतिहास गठबंधनों से भरा है—एनडीए से डीएमके तक। 2019 का असफल प्रयोग सबक सिखा चुका है। अब रामदास का फैसला पार्टी की किस्मत तय करेगा।
विपक्षी मोर्चे सतर्क हैं। एआईएडीएमके पुराने रिश्ते जोड़ना चाहता है, भाजपा केंद्र की ताकत दिखा रही है। डीएमके का संगठन और विकास कार्य भारी पड़ सकते हैं।
चुनावी समयसीमा नजदीक आ रही है। रामदास को कठिन निर्णय लेना होगा—सत्ता का साथ निभाएं या स्वतंत्रता बचाएं। तमिलनाडु की सत्ता कुर्सी इसी पर निर्भर करेगी।