पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों का गलत इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को कुचलने और उग्रवाद को पनाह देने का माध्यम बन गया है। वहीं पश्चिमी लोकतंत्रों में इस्लामोफोबिया का शब्द राजनीतिक हथियार है। एक विस्तृत रिपोर्ट इन साझा चालों को बेनकाब करती है।
पाकिस्तान में निजी झगड़े अक्सर ईशनिंदा के केस बन जाते हैं, खासकर ईसाइयों के खिलाफ। आरोपी लंबी कैद, सामाजिक तिरस्कार और गुंडागर्दी का शिकार होते हैं। कट्टरपंथी इन कानूनों से बच निकलते हैं और हिंसा फैलाते हैं।
पश्चिम में भी चरमपंथी हमलों की जांच को इस्लाम-विरोधी ठहराकर रोका जाता है। इससे जिहादी नेटवर्क मजबूत होते हैं।
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि किसी धर्म को थोपना स्वतंत्रता नहीं, दमन है। इससे मानवाधिकार और सह-अस्तित्व कमजोर होता है। सरकारों को कानूनी सुधार और साफ बहस की जरूरत है।