भारतीय पंचांग में बसंत पंचमी का विशेष स्थान है, जो न केवल विद्या आरंभ का प्रतीक है बल्कि होली महोत्सव के द्वार भी खोलता है। आखिर क्यों इस दिन से ही रंगों का त्योहार प्रारंभ हो जाता है? आइए जानें धार्मिक कथाओं, वैज्ञानिक तथ्यों और सांस्कृतिक रस्मों के इस अद्भुत संगम को।
माघ मास की शुक्ल पंचमी पर मनाया जाने वाला यह पर्व वसंतागमन का संदेशवाहक है। घर-घर सरस्वती माता की प्रतिमा सजती है, पीले फूलों और मिठाइयों से भक्ति का आलम छा जाता है। बच्चे पहली बार अक्षरों को स्पर्श करते हैं, नई शुरुआत का संकल्प लेते हैं।
होली का लंबा सफर यहीं शुरू होता है। होलिका की कथा से जुड़ा दहन अगले चंद्र मास में होता है, लेकिन सामग्री संग्रह पंचमी से प्रारंभ। ब्रज की होली परंपरा में कृष्ण-राधा की रासलीला का सूत्रपात इसी बसंत से जुड़ा है। टेसू के फूलों से गुलाल बनाना प्राचीन कला है।
ऋतु परिवर्तन का महत्वपूर्ण योगदान है। उत्तरायण के प्रभाव से सूर्य की किरणें गर्माहट लाती हैं, फसलें पकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सामूहिक भोज और स्विंग उत्सव आयोजित होते हैं। पोषण विशेषज्ञ वसंत के व्यंजनों को स्वास्थ्यवर्धक बताते हैं।
समकालीन भारत में यह परंपरा डिजिटल माध्यमों से फैल रही है। पर्यावरण प्रेमी प्राकृतिक रंगों का प्रचार करते हैं। बसंत पंचमी हमें सिखाती है कि उत्सव केवल आनंद नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल का प्रतीक है। होली की धूम इसी आधार पर चरमोत्कर्ष पर पहुंचती है।