बॉलीवुड के इतिहास में कुछ डायलॉग ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं को लांघ जाते हैं। जावेद अख्तर का ‘मेरे पास मां है’ इन्हीं अमर पंक्तियों में शुमार है। यह केवल शब्द नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक क्रांति थी।
सलीम खान के साथ उनकी साझेदारी ने हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग रचा। ‘जंजीर’ ने भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ विद्रोह का स्वर दिया। अमिताभ बच्चन को ‘गुस्सा जवान आदमी’ बनाया।
‘शोले’ बॉलीवुड का महाकाव्य बना। गब्बर का भयानक हास्य, जय-वीरू की यारी, बसंती का जोश—हर संवाद चरित्र को जीवंत करता था। ‘अरे ओ संभा!’ आज भी सबसे प्रसिद्ध विलेन डायलॉग है।
‘दीवार’ में मजदूर से गुंडे बनने की कहानी को भावनात्मक ऊंचाई दी। भाई का भाई से टकराव भारतीय परिवारों की सच्चाई दिखाता है।
‘त्रिशूल’ ने पितृत्व के अपराध को उजागर किया। ‘डॉन’ ने जासूसी को स्टाइलिश बना दिया। हर फिल्म में जावेद ने सामाजिक मुद्दों को मनोरंजन के साथ पिरोया।
उनकी सबसे बड़ी ताकत थी शब्दों की प्रामाणिकता। मुंबई की गलियों, गंवई धरती की बोली को परदे पर उतारा। ‘सिलसिला’ में प्रेम को परिपक्वता से दिखाया।
आज युवा पीढ़ी भी इन डायलॉग्स को सोशल मीडिया पर दोहराती है। जावेद अख्तर ने साबित कर दिया कि अच्छा लेखन अमर होता है।