पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, सरकारी कंपनियां घाटे में डूबी हैं। राजनीति का दखल, कमजोर शासन से ये न्यूनतम दामों पर सामान बेचने को मजबूर। एक्सप्रेस ट्रिब्यून बताती है कि सरकारें कठिन निर्णय टालती रहीं, घाटाग्रस्त कंपनियों को जीवित रखा जब तक कर्ज न दबा जाए। फिर जल्दबाजी में निजी बिक्री।
सभी क्षेत्रों में यही कहानी। व्यवसायिक नेतृत्व राजनीतिक पिछलग्गू बन जाता है, अनुशासन गायब। सार्वजनिक कोष से लंबे समय तक सहारा, फिर बिक्री में जनता का नुकसान, खरीदारों का लाभ।
पीआईए की कहानी दिल दहला देती है। प्रख्यात एयरलाइन अब अधःपतन की शिकार—अधिक स्टाफ, हस्तक्षेप, बाजार अंधता से। अनगिनत बैलआउट के बावजूद सेवा पतनोन्मुख, प्रतियोगिता नष्ट। निजीकरण प्रशासनिक असफलता की स्वीकारोक्ति मात्र।
पीटीसीएल में निजीकरण से उन्नति हुई—तकनीक आधुनिक, विस्तार। फिर भी कर्मचारी विवाद अनसुलझे, पेंशन-नियमन के केस चल रहे। यह बताता है कि सौदे प्राथमिकता में रहे, संस्थागत जिम्मेदारी गौण।
के-इलेक्ट्रिक उदाहरण है भ्रम का। निजी हुई लेकिन बिजली दरें आसमान छू रही। पाकिस्तान साबित करता है—निजीकरण बिना सुधार के महंगा तमाशा है, जो संकट को लंबा खींचेगा।