भारतीय संघीय बजट की कहानी प्रौद्योगिकी के साथ आगे बढ़ी है। स्वतंत्रता के समय की सादगी से आज के बहु-माध्यमिक प्रस्तुतियों तक, बदलाव आश्चर्यजनक हैं।
पहले बजट लंबे भाषण और भारी-भरकम फाइलों पर निर्भर थे। 1964 में मोरारजी देसाई का 5.5 घंटे का भाषण रिकॉर्ड है। 1955 से रंगीन किताबें आईं—लाल मुख्य बजट के लिए।
कंप्यूटर युग 1990 के दशक में आया। 2017 का टर्निंग पॉइंट: सूटकेस गया, टैबलेट आया। निर्मला सीतारमण ने बहिखाते को अपनाया। अब 11 बजे दस्तावेज वेबसाइट पर, ऐप डाउनलोड करोड़ों में।
3डी प्रोजेक्शन, एआई चैटबॉट्स, सोशल मीडिया इंगेजमेंट ने बजट को जीवंत बनाया। जनता का भागीदारी ‘मायगॉव’ से। फरवरी शेड्यूल, आउटकम बजटिंग जैसे सुधार प्रभावी।
ग्रामीण डिजिटल डिवाइड चुनौती, लेकिन भविष्य उज्ज्वल—वीआर टूर्स, मेटावर्स संभव। ये विकास शासन को समावेशी बना रहा है।