दरभंगा के नरगोना पैलेस से दुखद खबर आई है। अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का सोमवार को 92 वर्ष की उम्र में देहांत हो गया। मिथिला भूमि पर शोक का बादल मंडरा गया है।
महाराजा कामेश्वर सिंह की पत्नी के रूप में राजघराने में प्रवेश करने वाली कामसुंदरी देवी ने स्वतंत्रता के बाद भी राजपरंपराओं को निभाया। महाराजा के निधन के बाद वे परिवार की धुरी बनी रहीं। उनके दान से शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति आई।
मधुबनी चित्रकला और मैथिली कला को वैश्विक मंच दिलाने वालीं महारानी दुर्गा पूजा के भव्य आयोजन के लिए प्रसिद्ध थीं। गरीबों की शादियों से लेकर युवा कलाकारों को प्रोत्साहन तक, उनका जीवन सेवा समर्पित रहा।
खबर फैलते ही बाजार बंद हो गए। राजनीतिक व सांस्कृतिक हस्तियां श्रद्धा सभा में पहुंचीं। राज्य सरकार ने अंतिम संस्कार की व्यवस्था की है। वैदिक रीति से कल उनका अंतिम संस्कार होगा।
एक युग समाप्त हो गया। कामसुंदरी देवी की स्मृति मिथिला के हर कोने में बसी रहेगी। उनकी उदारता व भक्ति की गाथाएं आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी।