करण जौहर ने खुलकर स्वीकार किया कि ‘लापता लेडीज’ को सिनेमाघरों की कमी खली। किरण राव की इस बेहतरीन फिल्म ने नेटफ्लिक्स पर धूम मचाई, लेकिन जौहर का दिल थिएटर की यादों में खो गया। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता यह फिल्म सामाजिक संदेश के साथ मनोरंजन का बेहतरीन संगम है।
एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ‘मुझे अफसोस है कि यह फिल्म सिनेमाघर में न देख सका।’ पॉस्ट-पैंडेमिक दौर में ओटीटी का बोलबाला है, लेकिन जौहर थिएटर्स को फिल्मों का असली घर मानते हैं। दर्शकों का साथ फिल्म को अमर बनाता है।
कहानी ट्रेन यात्रा में दो बहुओं के गलत जगह पहुंच जाने से शुरू होती है। इससे उपजी घटनाएं पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर करारा प्रहार करती हैं। अभिनय और पटकथा की तारीफें होती रहीं।
धर्मा प्रोडक्शंस के सरताज जौहर का यह बयान युवा फिल्मकारों के लिए प्रेरणा है। वे हमेशा से क्वालिटी कंटेंट की पक्षधर रहे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या ‘लापता लेडीज’ जैसी फिल्में भविष्य में थिएटर्स सजाएंगी? जौहर का मलाल उद्योग को सोचने पर मजबूर कर रहा है। सिनेमाई परंपरा को नया जीवन देने का समय आ गया है।