महाभारत युग की गूंज आज भी खो-खो के मैदान पर सुनाई देती है। यह खेल प्राचीन काल की सैन्य ट्रेनिंग का जीवंत रूप है, जहां फुर्तीला दिमाग और मजबूत टीमवर्क जीत दिलाते हैं। सरल नियमों में छिपा जटिल रोमांच इसे अविस्मरणीय बनाता है।
27 मीटर लंबे मैदान पर आठ खूंटियों के बीच जंग छिड़ती है। आक्रमक टीम के आठ खिलाड़ी खूंटी पर बैठे रहते हैं। रक्षक धावक सांस रोककर दौड़ता है, विरोधी छोर को छूने का प्रयास करता है। एक पल की चूक और खेल पलट जाता है।
समयबद्ध इनिंग्स में हर सेकंड कीमती होता है। ग्रामीण अखाड़ों से विश्व पटल तक पहुंचा यह खेल एशियाई चैंपियनशिप में भारत की श्रेष्ठता का प्रतीक है। युवा प्रतिभाओं को निखारते कोचिंग सेंटर उभर रहे हैं।
महिला खिलाड़ी पुरुषों को टक्कर दे रही हैं, जिससे खेल का दायरा विस्तृत हो रहा। खो-खो न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक दक्षता का भी परीक्षण है, जो भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाता है। आने वाला दौर इसके वैश्विक विस्तार का साक्षी बनेगा।