भारत के शहरों पर प्रदूषण का कहर टूट पड़ा है। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने इसे केंद्र सरकार की नाकामी करार देते हुए एनसीएपी को ‘कागजी शोपीस’ बता दिया। पूर्व पर्यावरण मंत्री ने कहा कि यह कार्यक्रम केवल कागजों पर रह गया, जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं आया।
एनसीएपी के पांच साल: 122 शहरों (बाद में बढ़कर 131) में प्रदूषण 20-40% घटाने का वादा। हकीकत? अधिकांश शहरों में एक्यूआई खतरनाक स्तर पर। दिल्ली का हाल तो सबसे बुरा, जहां सर्दियों में ‘गंभीर’ श्रेणी आम बात हो गई।
रमेश ने खुलासा किया कि फंड का 70% हिस्सा बेकार पड़ा है। शहरों के एक्शन प्लान सामान्यताएं भरे हैं, जवाबदेही का अभाव। पराली जलाना, वाहन उत्सर्जन और फैक्ट्रियां बेलगाम। ‘यह आपराधिक लापरवाही है,’ उन्होंने फटकार लगाई।
लैंसेट पत्रिका के अध्ययन से साफ है कि प्रदूषण से 16 लाख मौतें सालाना। फेफड़ों की बीमारियां, हृदय रोग बढ़ रहे। अस्पताल भरे पड़े हैं। जीडीपी का 3% नुकसान।
कांग्रेस का विकल्प: ‘स्वच्छ वायु मिशन’ के तहत उपग्रह निगरानी, ईवी अनिवार्यता और दोषियों पर जुर्माना। रमेश ने यूपीए काल की उपलब्धियों का जिक्र किया।
सरकार ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (जीआरएपी) का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन यह अस्थायी उपाय हैं। उत्तर भारत में ‘स्मॉग सीजन’ शुरू होने वाला है।
यह विवाद चुनावी रंग ले सकता है। शहरी मतदाता पर्यावरण पर सतर्क। एनसीएपी की असफलता मोदी सरकार की पर्यावरण नीतियों पर सवाल उठाती है। साफ हवा के लिए निर्णायक कदम उठाने का वक्त आ गया है।