कांग्रेस पार्टी ने मनरेगा को सरकारी उपेक्षा से बचाने के उद्देश्य से ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ देश के कोने-कोने में प्रारंभ कर दिया। यह महाअभियान ग्रामीण मजदूरों की आवाज बनकर उभरा है, जो योजना के खस्ताहाल हालात पर सवाल उठा रहा है।
बिहार, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों में पदयात्राएं और सभाएं हो रही हैं। कार्यकर्ता भुगतान देरी, फर्जी जॉब कार्ड और बजट कटौती के खिलाफ एकजुट हो गए। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो साल में केंद्र का योगदान 35 प्रतिशत कम हुआ है।
अभियान की मांगें स्पष्ट हैं- दैनिक मजदूरी 300 रुपये, 100 प्रतिशत मांग पूरी और पारदर्शी ऐप-आधारित निगरानी। पंजाब के एक गांव में महिलाओं ने धरना दिया, जहां काम तो मिला मगर पैसा नहीं।
पार्टी का दावा है कि मनरेगा ने महामारी में लाखों को सहारा दिया, अब इसे खत्म करने की साजिश रच ली गई। वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी ने कहा, ‘ग्रामीण भारत का भविष्य दांव पर है।’
भाजपा नेताओं ने इसे चुनावी ड्रामा कहा, लेकिन जमीनी स्तर पर समर्थन बढ़ रहा है। यह संग्राम न केवल योजना को मजबूत करेगा, बल्कि कांग्रेस को ग्रामीण वोट बैंक वापस दिला सकता है। आने वाले महीनों में इसका असर साफ दिखेगा।