सालाना 1.5 लाख मौतें, 4.7 लाख घायल – भारत की सड़कें खून से लाल। राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह इस संकट से निपटने का सुनहरा मौका है। क्यों जरूरी? आंकड़े बताते हैं सब।
एनसीआरबी के अनुसार युवा 18-35 आयु वर्ग में 40 प्रतिशत मौतें। ट्रक-बस महज 5 प्रतिशत वाहन लेकिन 25 प्रतिशत हादसे। ग्रामीण इलाकों में साइनेज की कमी से अफरा-तफरी।
1972 से चल रहा यह अभियान रैलियों, वर्कशॉप से जागरूक करता। महाराष्ट्र में 50 हजार हेलमेट बांटे, सिर की चोटें घटीं। गुजरात स्कूलों में 20 लाख बच्चों को सिखाया।
राजस्थान का जीरो फैटलिटी कॉरिडोर मिसाल। बिहार जैसे राज्यों को अभी कोसों दूर। दुर्घटनाओं से 5.5 लाख करोड़ का नुकसान। परिवार टूट रहे, अर्थव्यवस्था चरमराई।
समाधान: एआई कैमरा, एबीएस ब्रेक, सख्त चेकिंग। विजन जीरो 2030 लक्ष्य। ई-चालान से जुर्माने 300 प्रतिशत बढ़े।
‘चलता है’ मानसिकता बदलनी होगी। सप्ताह दिशा दिखाता। भाग लें, प्रचार करें। सड़कें होंगी सुरक्षित, जीवन बचेंगे। बदलाव आपके हाथ में।