एक सदी से अधिक समय से पनामा नहर शक्ति संतुलन का प्रतीक है। 1962 के जनवरी में पनामा सिटी के उग्र प्रदर्शनों ने अमेरिकी नियंत्रण पर सवाल उठाए। पनामावासियों, खासकर युवाओं ने पूछा- हमारी जमीन पर बनी इस नहर पर हमारा अधिकार क्यों नगण्य?
1960 के दशक में शीत युद्ध के बीच अमेरिका इसे अपरिहार्य मानता था। मगर राष्ट्रवादी लहर ने दिखा दिया कि औपनिवेशिक मानसिकता अब चलेगी नहीं। दंगों ने वैश्विक मंच पर स्वामित्व की मांग को बुलंद किया।
परिणामस्वरूप 1977 में टोरीहोस-कार्टर समझौता हुआ। चरणबद्ध हस्तांतरण के बाद 1999 में पनामा ने नहर संभाली। अमेरिका का सैन्य प्रभुत्व समाप्त हुआ, पर रुचि बनी रही।
आज 2026 में परिदृश्य बदला है। चीन की मध्य अमेरिका में पैठ बढ़ी है, अमेरिका कूटनीति से जवाब दे रहा। जल संकट ने नहर की संवेदनशीलता बढ़ा दी, जो अब वैश्विक अर्थव्यवस्था की कुंजी है।
यह लंबी गाथा बताती है कि 1962 की जनक्रांति ने विश्व राजनीति को कैसे प्रभावित किया। संप्रभुता की लड़ाई कभी समाप्त नहीं होती, बल्कि नए रूप धारण कर जारी रहती है।