उर्वरक उद्योग में भारत ने बड़ी सफलता हासिल की है। कुल खपत के 73 प्रतिशत हिस्से को अब घरेलू उत्पादन पूरा कर रहा है। आयात पर पहले जैसी निर्भरता अब इतिहास बन चुकी है।
सरकार ने असम और गुजरात में मेगा प्लांट लगाकर और पुरानी इकाइयों को नया जीवन देकर यह संभव बनाया। यूरिया उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है, जबकि क्षमता उपयोग अनुपात चरम पर पहुंचा। रूस-यूक्रेन संकट जैसे वैश्विक संकटों से भी भारत अब अछूता रहा।
कृषि क्षेत्र इसका सबसे बड़ा लाभार्थी है। किसानों को सस्ते और समय पर उर्वरक मिल रहे हैं, जिससे खेती की लागत घटी और पैदावार बढ़ी। पंजाब के गेहूं खेतों से लेकर तमिलनाडु की धान की फसलों तक सकारात्मक बदलाव दिख रहा है।
हरित उर्वरकों पर शोध और ऊर्जा-कुशल तकनीकों ने स्थिरता सुनिश्चित की। डिजिटल प्लेटफॉर्म से वितरण पारदर्शी हुआ है। बाकी 27 प्रतिशत अंतर को भरने के लिए फॉस्फेट-पोटाश उत्पादन पर फोकस है।
यह प्रगति भारत की कृषि संप्रभुता को मजबूत करेगी। आने वाले वर्षों में उर्वरक क्षेत्र ग्रामीण विकास का इंजन बनेगा।