भ्रष्टाचार के एक और बड़े मामले में लालू प्रसाद यादव परिवार को झटका लगा है। दिल्ली कोर्ट ने लैंड फॉर जॉब्स स्कैम में लालू, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव पर औपचारिक आरोप तय कर दिए। उधर 52 सह-आरोपियों को कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
रेलवे नौकरी के बदले जमीन लेने का यह कांड यूपीए सरकार के दौर का है। लालू के रेल मंत्री रहते पटना के पॉश इलाकों की जमीनें उनके रिश्तेदारों के नाम दर्ज हुईं। एयरपोर्ट रोड, हाईवे के पास मौजूद प्रॉपर्टी का मूल्यांकन करोड़ों में है।
चार्जशीट में दर्ज ब्यौरा चौंकाने वाला है। नौकरी चाहने वालों ने जमीन दान में दे दी, बदले में रेलवे टिकट मिल गया। मेरिट लिस्ट, इंटरव्यू सब बायपास। सीबीआई-ईडी ने जमीन रजिस्ट्री, अपॉइंटमेंट लेटर और बैंक ट्रांजेक्शन के रिकॉर्ड खंगाले।
जज गीतांजलि वर्मा का 40 पेज का फैसला ऐतिहासिक है। मुख्य आरोपी बनाम गौण आरोपी में स्पष्ट विभाजन किया गया। भ्रष्टाचार अधिनियम, चोरी, साजिश के चार्ज मुख्य तीनों पर लागू। बाकियों के लिए प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता।
आरजेडी मुख्यालय में हंगामा मच गया। कार्यकर्ताओं ने कोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया। पार्टी ने इसे केंद्र की साजिश करार दिया। तेजस्वी ने ट्वीट कर निर्दोषता का दावा किया और कानूनी लड़ाई का वादा किया।
बिहार उपचुनावों के नतीजे आने के बाद आया यह फैसला महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी है। नितीश कुमार की जेडीयू चुप्पी साधे हुए है। बीजेपी ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान की जीत बताया।
मुकदमे का अगला चरण सबूतों की जांच और क्रॉस एग्जामिनेशन होगा। लालू परिवार के वकील सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। चारा घोटाले की तरह लंबा कानूनी संघर्ष नजर आता है।
यह घटनाक्रम राजनीतिक भ्रष्टाचार, परिवारवाद और सरकारी नौकरियों के बाजारीकरण पर सवाल खड़े करता है। बिहार की जनता 2025 चुनावों में इसका फैसला करेगी।