देशभर के बच्चे एक अदृश्य युद्ध लड़ रहे हैं – मानसिक स्वास्थ्य का। मोबाइल की चकाचौंध, परीक्षाओं का दबाव और घरेलू कलह इसकी जड़ें हैं। छात्र आत्महत्याओं में वृद्धि चिंताजनक है।
एनसीआरबी डेटा के अनुसार, हर साल 4 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। 70 फीसदी मामले पढ़ाई के तनाव और सोशल मीडिया लत से जुड़े हैं। इंस्टाग्राम, टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म आत्मविश्वास चूर करते हैं।
शिक्षा प्रणाली भी कम जिम्मेदार नहीं। 8 साल के बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। ट्यूशन और होमवर्क ने खेल-कूद खत्म कर दिया।
परिवार में झगड़े, लापरवाही या अपेक्षाओं का बोझ बच्चे को तोड़ देता है। मनोचिकित्सक कहते हैं, ‘घर का जहर सीधा दिमाग में घुसता है।’
उपाय के तौर पर डिजिटल डिटॉक्स, भावनात्मक समर्थन कार्यशालाएं और नीतिगत बदलाव जरूरी हैं। मानसिक स्वास्थ्य को पढ़ाई जितना महत्व दें, तभी बच्चे फूलेंगे-फलेंगे।