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    Home»World»शेख हसीना की मौत की सज़ा: भारत के लिए कानूनी और कूटनीतिक चुनौती
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    शेख हसीना की मौत की सज़ा: भारत के लिए कानूनी और कूटनीतिक चुनौती

    Indian SamacharBy Indian SamacharNovember 18, 20253 Mins Read
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    बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को ढाका की अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने मौत की सज़ा सुनाई है। यह फैसला न केवल बांग्लादेश की राजनीति में भूचाल ला दिया है, बल्कि भारत के लिए भी एक जटिल कूटनीतिक और कानूनी चुनौती खड़ी कर दी है, खासकर तब जब हसीना कथित तौर पर भारत में शरण लिए हुए हैं।

    **फैसले की पृष्ठभूमि**

    ICT का यह निर्णय 2024 के छात्र आंदोलन के संदर्भ में आया है। यह आंदोलन मूल रूप से नौकरी-कोटा प्रणाली के विरोध में शुरू हुआ था, लेकिन इसने जल्द ही हसीना सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों का रूप ले लिया। इन प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों के लिए हसीना को जिम्मेदार ठहराया गया है।

    **हसीना पर लगे गंभीर आरोप**

    न्यायाधिकरण ने हसीना पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं, जिनमें शामिल हैं:

    * हत्याओं के आदेश देना।
    * हिंसक कृत्यों को उकसाने वाले भाषण देना।
    * सबूतों को नष्ट करने और न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिश करना।
    * छात्र नेता अबू सईद की हत्या के पीछे होने का आरोप।
    * चांखारपुल में पांच लोगों की हत्या और उनके शवों को जलाने में संलिप्तता।

    इनमें से कुछ आरोपों के लिए उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई है, जबकि अन्य के लिए आजीवन कारावास की सज़ा दी गई है।

    **अपील की शर्त और हसीना का रुख**

    कानूनी प्रक्रिया के तहत, हसीना को फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए 30 दिन का समय दिया गया है। हालांकि, एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि वह देश के बाहर रहते हुए अपील नहीं कर सकतीं। हसीना ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह बांग्लादेश नहीं लौटेंगी। उन्होंने इस फैसले को ‘पक्षपातपूर्ण’ और ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ करार दिया है और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्याय की गुहार लगाने की बात कही है।

    **भारत पर प्रत्यर्पण का दबाव**

    बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने हसीना को भारत से प्रत्यर्पित करने की मांग की है, और उन्होंने 2013 की प्रत्यर्पण संधि का हवाला दिया है। यह संधि दोनों देशों के बीच आपराधिक मामलों में सहयोग के लिए की गई थी।

    हालांकि, संधि की अपनी सीमाएं हैं। इसके अनुच्छेद 6 के अनुसार, यदि किसी अपराध को राजनीतिक प्रकृति का माना जाता है, तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है। चूंकि हसीना का दावा है कि उनके खिलाफ मामला राजनीतिक है, भारत के पास प्रत्यर्पण से इनकार करने का कानूनी आधार मौजूद है।

    **ICT की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न**

    बांग्लादेश का अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) स्वयं विवादों में घिरा रहा है। इस अदालत का गठन मूल रूप से 1971 के युद्ध अपराधों के लिए हुआ था, लेकिन बाद में हसीना के शासन में इसमें संशोधन कर हाल की घटनाओं को भी शामिल किया गया। वर्तमान अंतरिम सरकार द्वारा न्यायाधीशों और अभियोजकों की नियुक्ति ने इसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर इसे ‘कंगारू कोर्ट’ भी कहा जा रहा है।

    **बांग्लादेश में अस्थिरता का माहौल**

    इस फैसले ने बांग्लादेश में राजनीतिक तनाव को काफी बढ़ा दिया है। हसीना के समर्थकों द्वारा विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं, जिससे देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका है। यह स्थिति देश को एक बार फिर अस्थिरता की ओर धकेल सकती है।

    भारत, अपने पड़ोसी देश की इस संवेदनशील स्थिति में, एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। उसे अपने राजनयिक संबंधों, प्रत्यर्पण संधि की शर्तों और क्षेत्रीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए कोई भी कदम उठाना होगा।

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